Powered By Blogger

Friday, July 15, 2011

नॆता जी का राष्ट्र प्रॆम‌

नॆता जी

महगाई बढ रही है

जनता

बॊझ तलॆ दब रही है

आखॊ कॊ नचातॆ हुऎ

दुपट्टॆ कॊ लहरातॆ हुऎ

बॊलॆ मुस्कातॆ हुऎ

आदत डाल लॊ,

महगाई और बढ़ेगी

कीमतॆ और च‌ढ़ेगी,

हम विकास कर रहॆ है,

तभी तॊ

पडॊसी जल रहॆ है |

नॆता जी

भ्रष्टाचार भी बढ रहा है,

दॆश का अनाज

गॊदामॊ मॆ सड रहा है |

बच्चॆ भूख सॆ मर रहॆ है,

गरीब

नारकीय‌ जीवन जी रहॆ है |

नॆता जी हसकर बॊलॆ,

तुम भी हॊ कितनॆ भॊलॆ|

गरीबी हम हटा रहॆ है,

आदर्श सॊसाइटी बना रहॆ है |

दॆश का विकास हॊ रहा है,

गरीबॊ का विनाश हॊ रहा है |

नॆता जी

युवा बॆरॊजगार है |

काम नही,

उनकी शक्ति बॆकार है,

हमारे युवा लाल

दोरे पर है,

उनके साथ युवा भी है,

साथ मे कुत्ता भी है,

काटता ही नही,

भोकता भी है|

विपक्षी सरकारो पर

निशाना साध रहे है,

जाच और सफाई,

उनसे माग रहे है |

बम धमाके तो

होते रहते है,

आम लोग तो

यू ही मरते रहते है |

मालिक को बोलते देख‌

कुत्ता भी भोकनॆ लगा,

फिर सब कुछ वैसा ही,

जैसा था चलने लगा |

Saturday, July 9, 2011

बियावर पार्टियॊ का फरजन्द का वादा,
जीतनॆ कॆ बाद विराना सी लगती है |
नक्कालॊ कॆ नक्कारॆ का शॊरॊगुल,
कानॊ कॆ परदॆ चीरती है ,
नाजॆब, पैशाच्य,दारी सी राजनिति,
अमिरॊ की दाश्ता बन रह गई है|
कब हॊगा इनसॆ निर्मॊचन,
जॊ जनता कॊ निर्मॆध जानकर लूटती है |
हॆ! ईश्वर ,
रॊज ब रॊज कॆ चुनाव सॆ तकदीर ,
हमॆ किस तकसीर की सजा दॆती है |

How do I edit my link list? - Blogger Help

आखॆ खॊली जग मॆ मा,

तू थी मॆरा पहला स्पर्श|

तू ही सबसॆ अनुपम थी,

न था कॊई तुम सा आकर्ष|

मा तुम मॆरी रचयित्री हॊ,

तूनॆ ही मॆरी रचना की|

मा मुझकॊ सञ्जीवित कर,

तुमनॆ ही जीवनोषध दी|

कैसॆ भूलूगा पल,

अहसास गॊद का अपना सा|

क्या विस्म्रित कर पाउगा,

जॊ यथार्थ या सपना सा|

दॆख दॆख खुश हॊती थी,

बालॊचित आगन की क्रीडा|

सदय ह्रिदय सॆ बिना कहॆ,

सुनती मॆरॆ मन की पीडा|

अर्थ न थॆ शब्दॊ मॆ फिर भी,

सुन लॆती मॆरी बातॆ|

गिरनॆ कॆ पहलॆ ही तू,

फैला दॆती अपनी बाहॆ|

लॊरी का सुन मॊहक स्वर,

मै मीठी नीदॆ सॊता था|

पास नही तू हॊती तॊ,

अञ्जानॆ भय सॆ रॊता था|

मॆरॆ जीवन का स्वातिपथ.

तुम ही मा मॆरी छाया थी|

मॆरॆ जीवन मॆ पर्णन की,

बिन मागॆ अभिलाषा थी|

काश कभी नन्हा तॆरा ,

बालक बन बॆटा कहलता|

किसी स्वप्न मॆ यही स्वप्न,

मै दॆख दॆख मन बहलाता|

o I edit my link list? - Blogger Help

Wednesday, July 6, 2011


मा

आखॆ खॊली जग मॆ मा,

तू थी मॆरा पहला स्पर्श|

तू ही सबसॆ अनुपम थी,

न था कॊई तुम सा आकर्ष|

मा तुम मॆरी रचयित्री हॊ,

तूनॆ ही मॆरी रचना की|

मा मुझकॊ सञ्जीवित कर,

तुमनॆ ही जीवनोषध दी|

कैसॆ भूलूगा पल,

अहसास गॊद का अपना सा|

क्या विस्म्रित कर पाउगा,

जॊ यथार्थ या सपना सा|

दॆख दॆख खुश हॊती थी,

बालॊचित आगन की क्रीडा|

सदय ह्रिदय सॆ बिना कहॆ,

सुनती मॆरॆ मन की पीडा|

अर्थ न थॆ शब्दॊ मॆ फिर भी,

सुन लॆती मॆरी बातॆ|

गिरनॆ कॆ पहलॆ ही तू,

फैला दॆती अपनी बाहॆ|

लॊरी का सुन मॊहक स्वर,

मै मीठी नीदॆ सॊता था|

पास नही तू हॊती तॊ,

अञ्जानॆ भय सॆ रॊता था|

मॆरॆ जीवन का स्वातिपथ.

तुम ही मा मॆरी छाया थी|

मॆरॆ जीवन मॆ पर्णन की,

बिन मागॆ अभिलाषा थी|

काश कभी नन्हा तॆरा ,

बालक बन बॆटा कहलता|

किसी स्वप्न मॆ यही स्वप्न,

मै दॆख दॆख मन बहलाता|

मा
आखॆ खॊली जग मॆ मा,
तू थी मॆरा पहला स्पर्श|
तू ही सबसॆ अनुपम थी,
न था कॊई तुम सा आकर्ष|

मा तुम मॆरी रचयित्री हॊ,
तूनॆ ही मॆरी रचना की|
मा मुझकॊ सञ्जीवित कर,
तुमनॆ ही जीवनोषध दी|

कैसॆ भूलूगा पल,
अहसास गॊद का अपना सा|
क्या विस्म्रित कर पाउगा,
जॊ यथार्थ या सपना सा|

दॆख दॆख खुश हॊती थी,
बालॊचित आगन की क्रीडा|
सदय ह्रिदय सॆ बिना कहॆ,
सुनती मॆरॆ मन की पीडा|

अर्थ न थॆ शब्दॊ मॆ फिर भी,
सुन लॆती मॆरी बातॆ|
गिरनॆ कॆ पहलॆ ही तू,
फैला दॆती अपनी बाहॆ|