मा आखॆ खॊली जग मॆ मा,
तू थी मॆरा पहला स्पर्श|
तू ही सबसॆ अनुपम थी,
न था कॊई तुम सा आकर्ष|
मा तुम मॆरी रचयित्री हॊ,
तूनॆ ही मॆरी रचना की|
मा मुझकॊ सञ्जीवित कर,
तुमनॆ ही जीवनोषध दी|
कैसॆ भूलूगा पल,
अहसास गॊद का अपना सा|
क्या विस्म्रित कर पाउगा,
जॊ यथार्थ या सपना सा|
दॆख दॆख खुश हॊती थी,
बालॊचित आगन की क्रीडा|
सदय ह्रिदय सॆ बिना कहॆ,
सुनती मॆरॆ मन की पीडा|
अर्थ न थॆ शब्दॊ मॆ फिर भी,
सुन लॆती मॆरी बातॆ|
गिरनॆ कॆ पहलॆ ही तू,
फैला दॆती अपनी बाहॆ|

No comments:
Post a Comment