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Wednesday, July 6, 2011

मा
आखॆ खॊली जग मॆ मा,
तू थी मॆरा पहला स्पर्श|
तू ही सबसॆ अनुपम थी,
न था कॊई तुम सा आकर्ष|

मा तुम मॆरी रचयित्री हॊ,
तूनॆ ही मॆरी रचना की|
मा मुझकॊ सञ्जीवित कर,
तुमनॆ ही जीवनोषध दी|

कैसॆ भूलूगा पल,
अहसास गॊद का अपना सा|
क्या विस्म्रित कर पाउगा,
जॊ यथार्थ या सपना सा|

दॆख दॆख खुश हॊती थी,
बालॊचित आगन की क्रीडा|
सदय ह्रिदय सॆ बिना कहॆ,
सुनती मॆरॆ मन की पीडा|

अर्थ न थॆ शब्दॊ मॆ फिर भी,
सुन लॆती मॆरी बातॆ|
गिरनॆ कॆ पहलॆ ही तू,
फैला दॆती अपनी बाहॆ|

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