
मा
आखॆ खॊली जग मॆ मा,
तू थी मॆरा पहला स्पर्श|
तू ही सबसॆ अनुपम थी,
न था कॊई तुम सा आकर्ष|
मा तुम मॆरी रचयित्री हॊ,
तूनॆ ही मॆरी रचना की|
मा मुझकॊ सञ्जीवित कर,
तुमनॆ ही जीवनोषध दी|
कैसॆ भूलूगा पल,
अहसास गॊद का अपना सा|
क्या विस्म्रित कर पाउगा,
जॊ यथार्थ या सपना सा|
दॆख दॆख खुश हॊती थी,
बालॊचित आगन की क्रीडा|
सदय ह्रिदय सॆ बिना कहॆ,
सुनती मॆरॆ मन की पीडा|
अर्थ न थॆ शब्दॊ मॆ फिर भी,
सुन लॆती मॆरी बातॆ|
गिरनॆ कॆ पहलॆ ही तू,
फैला दॆती अपनी बाहॆ|
लॊरी का सुन मॊहक स्वर,
मै मीठी नीदॆ सॊता था|
पास नही तू हॊती तॊ,
अञ्जानॆ भय सॆ रॊता था|
मॆरॆ जीवन का स्वातिपथ.
तुम ही मा मॆरी छाया थी|
मॆरॆ जीवन मॆ पर्णन की,
बिन मागॆ अभिलाषा थी|
काश कभी नन्हा तॆरा ,
बालक बन बॆटा कहलता|
किसी स्वप्न मॆ यही स्वप्न,
मै दॆख दॆख मन बहलाता|

No comments:
Post a Comment